पंजाबी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए प्रतिबद्ध है गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी

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गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी में आयोजित गोष्ठी के दौरान वाइस चांसलर प्रो. करमजीत सिंह, डॉ. मनजिंदर सिंह, माधव कौशिक, प्रो. मनमोहन सिंह एवं अन्य विद्वान उपस्थित रहे।

लाइव भारत / मनी शर्मा अमृतसर-अप्रैल -2026

गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रो. करमजीत सिंह ने कहा कि विश्वविद्यालय पंजाबी मातृभाषा के प्रचार-प्रसार के लिए हमेशा प्रतिबद्ध रहा है और वर्तमान समय में भी इसके विकास हेतु निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं।

वह विश्वविद्यालय के पंजाबी अध्ययन स्कूल द्वारा आयोजित “मध्यकालीन पंजाबी साहित्य: प्रसार और प्रासंगिकता” विषय पर अकादमिक गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे थे।

प्रो. करमजीत सिंह ने अपने संबोधन में गुरु नानक देव जी, बाबा फरीद तथा बुल्ले शाह जैसे महान संतों और सूफी कवियों की वाणी का उल्लेख करते हुए कहा कि उनका साहित्य आज भी मानवता को सही दिशा देने और आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करता है।

यह गोष्ठी भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय और साहित्य अकादेमी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की गई। पंजाबी अध्ययन स्कूल के प्रमुख डॉ. मनजिंदर सिंह ने अतिथियों का स्वागत किया।

साहित्य अकादेमी के पंजाबी सलाहकार बोर्ड के संयोजक रवेल सिंह ने कहा कि मध्यकालीन पंजाबी साहित्य, जिसमें सूफी, गुरमत, किस्सा और वीर काव्य शामिल हैं, आज की साहित्यिक सोच की आधारशिला है। उन्होंने कहा कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े बिना आधुनिक साहित्य को समझना संभव नहीं है।

मुख्य अतिथि साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष माधव कौशिक ने कहा कि पंजाबी साहित्य की भारतीय साहित्य में विशिष्ट पहचान है और इसका मध्यकालीन साहित्य मानववाद एवं विश्व शांति का संदेश देता है, जो आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक है।

इस अवसर पर प्रोफेसर ऑफ एमिनेंस मनमोहन सिंह ने अपने मुख्य भाषण में कहा कि मध्यकालीन पंजाबी साहित्य गहरे दार्शनिक आधार पर टिका हुआ है और यह सामाजिक असमानता व अन्याय के खिलाफ सशक्त स्वर प्रस्तुत करता है। उन्होंने इस क्षेत्र में शोध की कमी पर भी चिंता व्यक्त की।

गोष्ठी के विभिन्न सत्रों में विद्वानों ने गुरबाणी, अद्वैतवाद, सूफी काव्य, भाषा विकास तथा सामाजिक समानता जैसे विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत किए। वक्ताओं ने कहा कि मध्यकालीन साहित्य आज भी महिला अधिकार, सामाजिक न्याय और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर मार्गदर्शन प्रदान करता है।

कार्यक्रम के अंत में वक्ताओं ने इस प्रकार की अकादमिक गतिविधियों को साहित्यिक संवाद को जीवित रखने के लिए आवश्यक बताया।